छत्तीसगढ़ में बोरे-बासी पर सियासी रार: भाजपा ने याद दिलाया 9 करोड़ का ‘घोटाला’, कांग्रेस का पलटवार…NV News

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NV News- छत्तीसगढ़ में 1 मई यानी अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस के अवसर पर पारंपरिक व्यंजन ‘बोरे-बासी’ को लेकर एक बार फिर सियासत गरमा गई है। राज्य की वर्तमान भाजपा सरकार और विपक्षी दल कांग्रेस के बीच इस पारंपरिक खान-पान को लेकर तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। जहाँ कांग्रेस इस दिन को ‘मजदूरों के सम्मान’ और छत्तीसगढ़ी संस्कृति के उत्सव के रूप में मना रही है, वहीं सत्ताधारी भाजपा ने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में हुए बोरे-बासी आयोजनों के खर्चों को लेकर हमला बोल दिया है। भाजपा नेताओं ने सोशल मीडिया और प्रेस वार्ताओं के जरिए जनता को याद दिलाया कि कैसे पिछली सरकार ने इस आयोजन के नाम पर करोड़ों रुपए की “फिजूलखर्ची” की थी।

सियासी घमासान के केंद्र में विधानसभा में हुआ वह खुलासा है, जिसमें बताया गया था कि कांग्रेस शासन के दौरान एक दिन के बोरे-बासी कार्यक्रम में लगभग ₹8.97 करोड़ खर्च किए गए थे। भाजपा का आरोप है कि 50 हजार श्रमिकों के नाम पर हुए इस आयोजन में करोड़ों का “बोरे-बासी घोटाला” हुआ, जहाँ टेंडर और आयोजनों में बंदरबांट की गई। भाजपा विधायकों का तर्क है कि छत्तीसगढ़िया संस्कृति के नाम पर सरकारी खजाने की लूट की गई, जबकि मजदूर आज भी अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। भाजपा इसे केवल ‘दिखावे की राजनीति’ करार दे रही है।

दूसरी ओर, पीसीसी चीफ दीपक बैज और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भाजपा के इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए सरकार पर ‘नकल’ करने का आरोप लगाया है। कांग्रेस का कहना है कि जिस बोरे-बासी त्यौहार का भाजपा कभी मजाक उड़ाती थी, अब सत्ता में आने के बाद वह उसी परंपरा को अपना रही है। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि ₹9 करोड़ का खर्च श्रमिकों के प्रति सम्मान और सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए था, जो एक बड़ा निवेश था। दीपक बैज ने तंज कसते हुए कहा कि भाजपा को छत्तीसगढ़ी परंपराओं से नफरत है, इसलिए वे मजदूरों के इस पावन पर्व को घोटाले का नाम दे रहे हैं।

बोरे-बासी को लेकर यह विवाद केवल खाने की मेज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ी अस्मिता और आगामी राजनीतिक समीकरणों से भी जुड़ा हुआ है। जहाँ भाजपा अपनी ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के तहत पिछले भ्रष्टाचारों को कुरेद रही है, वहीं कांग्रेस अपनी ‘छत्तीसगढ़ियावाद’ की छवि को बरकरार रखने की कोशिश में है। श्रमिक दिवस पर ठंडा-ठंडा बोरे-बासी खाने की यह परंपरा आज प्रदेश की राजनीति में सबसे गर्म मुद्दा बन गई है, जिससे यह साफ है कि आने वाले समय में भ्रष्टाचार और संस्कृति की यह जंग और तेज होगी।

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