छत्तीसगढ़-आंध्र गौ-तस्करी रैकेट: जंगलों के रास्ते मवेशियों की ‘सप्लाई चेन’, कॉर्पोरेट स्टाइल में चल रहा सिंडिकेट…NV News
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NV News- छत्तीसगढ़ के गरियाबंद से ओडिशा के रास्ते आंध्र प्रदेश तक फैले एक विशाल गौ-तस्करी सिंडिकेट का पर्दाफाश हुआ है। यह अवैध कारोबार किसी संगठित कॉर्पोरेट सिस्टम की तरह काम कर रहा है, जिसमें स्थानीय दलाल, मजदूर और क्षेत्रीय तंत्र की मिलीभगत से मवेशियों को कसाईखानों तक पहुंचाया जा रहा है। पुलिस की नजरों से बचने के लिए तस्करों ने मुख्य सड़कों (बीजू फोरलेन) के बजाय दुर्गम पहाड़ी रास्तों और घने जंगलों को अपना सुरक्षित गलियारा बना लिया है।
इस सिंडिकेट का ऑपरेशन तीन प्रमुख चरणों में बंटा है। पहले पड़ाव में गरियाबंद के देवभोग क्षेत्र से मवेशियों को इकट्ठा कर आधी रात को ओडिशा सीमा पार कराई जाती है। इसके बाद ओडिशा के कालाहांडी स्थित धरमगढ़ की साप्ताहिक मंडी में इन मवेशियों का सौदा होता है, जहां हर शुक्रवार को हजारों की संख्या में गाय-बैल बिकते हैं। अंतिम चरण में मजदूरों की टोलियां इन मवेशियों को पैदल हांककर लगभग 150 किमी दूर आंध्र प्रदेश की सीमा तक पहुंचाती हैं। इस दुर्गम सफर में 3 से 4 दिन का समय लगता है।
आर्थिक मुनाफे का यह गणित बेहद चौंकाने वाला है। 1500 रुपये में खरीदे गए मवेशी आंध्र पहुंचते-पहुंचते 4000 रुपये तक की कीमत में बिकते हैं। इस काम के लिए मजदूरों को प्रति मवेशी 300 से 500 रुपये का भुगतान किया जाता है। विडंबना यह है कि पिछले छह वर्षों (2020 से 2026) के आंकड़ों के अनुसार, इतना बड़ा रैकेट सक्रिय होने के बावजूद पुलिस रिकॉर्ड में तस्करी के मामले बेहद कम दर्ज हैं, जो प्रशासनिक निगरानी पर बड़े सवाल खड़े करता है।

