Chhattisgarh UCC Row: छत्तीसगढ़ में UCC की आहट! आदिवासी अस्मिता बनाम कानून की एकरूपता, जानें क्या है सियासी विवाद का केंद्र?…NV News
Share this
छत्तीसगढ़ की राजनीति में ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) के मुद्दे ने एक नया उबाल पैदा कर दिया है। प्रदेश में UCC लागू करने की चर्चाओं ने जहां एक तरफ भाजपा को ‘समानता और आधुनिकता’ के पक्ष में खड़ा कर दिया है, वहीं कांग्रेस इसे आदिवासी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान और अधिकारों पर सीधे हमले के रूप में देख रही है। राज्य में उत्तराखंड मॉडल के अनुसरण की चर्चाओं ने इस विवाद को और भी हवा दे दी है।
विवाद के मुख्य बिंदु: भाजपा बनाम कांग्रेस
यह मुद्दा केवल कानूनी नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के सामाजिक और आदिवासी ढांचे से जुड़ा हुआ है।
भाजपा का पक्ष: सरकार और सत्ताधारी दल का तर्क है कि UCC का उद्देश्य देश के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे विषयों पर एकसमान कानून लाना है। भाजपा इसे लैंगिक न्याय (Gender Justice) और ‘एक देश, एक कानून’ की दिशा में जरूरी सुधार मानती है।
कांग्रेस का पक्ष: कांग्रेस का आरोप है कि UCC से छत्तीसगढ़ के विशाल आदिवासी समाज के ‘रूढ़िगत कानूनों’ (Customary Laws) का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। विपक्ष का तर्क है कि आदिवासियों की परंपराएं, पांचवीं अनुसूची और PESA (पंचायत उपबंध – अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) कानून उन्हें विशेष अधिकार और संरक्षण देते हैं, जिन्हें UCC के दायरे में लाना संविधान की मूल भावना के विरुद्ध होगा।
उत्तराखंड मॉडल की चर्चा क्यों?
उत्तराखंड भारत का वह पहला राज्य बना है जिसने UCC को विधायी प्रक्रिया के माध्यम से आगे बढ़ाया है। छत्तीसगढ़ में इसी मॉडल की चर्चा इसलिए है क्योंकि:
ब्लूप्रिंट: उत्तराखंड का कानून विवाह के पंजीकरण और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे संवेदनशील मुद्दों को कवर करता है। छत्तीसगढ़ सरकार इसी तर्ज पर अध्ययन की बात कर रही है।
ध्रुवीकरण: उत्तराखंड में इसे एक ऐतिहासिक कदम के रूप में प्रचारित किया गया, जिसे भाजपा अब अन्य राज्यों में भी दोहराना चाहती है।
छत्तीसगढ़ की राजनीति का केंद्र हमेशा से ‘आदिवासी’ रहे हैं। चूंकि राज्य की कुल आबादी का करीब 30% से अधिक हिस्सा आदिवासी है, इसलिए किसी भी ऐसे कानून का असर सीधे तौर पर चुनावी समीकरणों और सामाजिक शांति पर पड़ेगा। आदिवासी संगठनों की चिंता यह है कि क्या UCC उनके पारंपरिक विवाह और संपत्ति के हस्तांतरण के नियमों को बदल देगा?
फिलहाल, सरकार और विपक्षी दल इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार आदिवासी संगठनों के साथ संवाद स्थापित कर इस गतिरोध को कैसे दूर करती है।
