सुशासन का ‘बस्तर मॉडल’: डिजिटल गवर्नेंस और ग्रासरूट ब्यूरोक्रेसी से बदला राजस्व सेवाओं का चेहरा; फाइलों के बजाय खुद जनता के द्वार पहुंचा प्रशासन…NV News

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NV News जगदलपुर: प्रशासनिक व्यवस्था में किसी भू-स्वामी की मृत्यु के बाद उनके कानूनी वारिसों के नाम जमीन ट्रांसफर करने यानी ‘फौती नामांतरण’ (Mutation) को हमेशा से एक बेहद पेचीदा और लंबी कागजी औपचारिकताओं वाली प्रक्रिया माना जाता रहा है। ग्रामीण और विशेषकर जनजातीय अंचलों में जानकारी के अभाव तथा बिचौलियों के जाल के कारण ये मामले दशकों तक लंबित रहते हैं, जिससे पारिवारिक विवाद बढ़ते हैं। इस पारंपरिक और रूढ़िवादी ढर्रे को पूरी तरह बदलते हुए छत्तीसगढ़ के जनजातीय बहुल जिले बस्तर ने सुशासन का एक ऐसा ‘सक्रिय मॉडल’ (Proactive Model) प्रस्तुत किया है, जो पूरे देश और राज्य के अन्य जिलों के लिए एक मार्गदर्शक केस स्टडी बन चुका है। बस्तर जिला प्रशासन ने पारंपरिक ‘रिएक्टिव’ (प्रतिक्रियात्मक) रवैये को छोड़कर ‘प्रोएक्टिव’ रुख अपनाया और फाइलें लेकर दफ्तर पहुंचने वाली जनता के बजाय खुद प्रशासन जनता के दरवाजे तक पहुंचा।

इस प्रोएक्टिव गवर्नेंस मॉडल की जमीनी सफलता का असली श्रेय ‘ग्रासरूट ब्यूरोक्रेसी’ के उस अनूठे तालमेल को जाता है, जिसने सेवा वितरण की पूरी परिभाषा ही बदल दी है। इस पूरे अभियान को एक सुव्यवस्थित पिरामिड की तरह संचालित किया गया, जिसके शीर्ष पर तहसीलदार और नायब तहसीलदार मॉनिटरिंग कर रहे थे, वहीं मैदानी स्तर पर ग्राम सचिव, पटवारी और कोटवार की ‘त्रिमूर्ति’ ने मोर्चा संभाला। ग्राम सचिव ने पिछले 4 वर्षों में मृत हुए 17,405 व्यक्तियों की सूची तैयार की। इसके बाद, पटवारी ने छत्तीसगढ़ के डिजिटल लैंड रिकॉर्ड पोर्टल ‘भुइयां’ से इसका मिलान कर 8,651 ऐसे मृत भू-स्वामियों की पहचान की जिनकी जमीन दर्ज थी और उनका ‘वंश वृक्ष’ तैयार किया। अंत में, गांव की सबसे पारंपरिक कड़ी ‘कोटवार’ ने सोशल ऑडिट (सामाजिक सत्यापन) कर किसी भी प्रकार के फर्जीवाड़े की गुंजाइश को पूरी तरह खत्म कर दिया।

आंकड़ों के लिहाज से देखें तो जिले की सभी 10 तहसीलों के कुल 639 गांवों में से 611 गांवों को इस मुहिम से जोड़कर अभूतपूर्व परिणाम हासिल किए गए हैं। मैदानी अमले द्वारा चिन्हित किए गए कुल 8,651 आवश्यक मामलों में से रिकॉर्ड 8,241 मामलों में ऑनलाइन नामांतरण पंजी (MD सीरिज) के तहत विधिक प्रक्रिया पूर्ण कर अंतिम आदेश पारित किए जा चुके हैं और अब पूरे जिले में महज 410 प्रकरण ही शेष बचे हैं। इस मुहिम में तोकापाल तहसील सर्वाधिक 1,454 मामलों का निपटारा कर सबसे आगे रही। वहीं बकावण्ड तहसील अपने 1,153 मामलों में से 1,142 को पूर्ण कर शत-प्रतिशत ‘सेचुरेशन’ (सौ फीसदी लक्ष्य) के बिल्कुल करीब है। इसके अलावा जगदलपुर (1,057 निपटारे), बस्तर (1,019 निपटारे), भानपुरी (959 निपटारे) और लोहण्डीगुड़ा (799 निपटारे) ने भी प्रशासनिक दक्षता का अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है।

भौगोलिक रूप से दुर्गम और अंदरूनी वनांचल इलाकों से घिरे करपावण्ड, नानगुर, दरभा और बास्तानार अंचलों में भी सीमित संसाधनों के बावजूद भू-अभिलेखों को दुरुस्त करने की यह तेज रफ्तार कायम रही। स्वतः संज्ञान (Suo Motu) और डिजिटल ट्रैकिंग के कारण इस पूरी प्रक्रिया से बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो गई है, जिससे आदिवासियों और किसानों को मानसिक व आर्थिक प्रताड़ना से मुक्ति मिली है। भूमि रिकॉर्ड अपडेट होने से अब ये नए भू-स्वामी किसान क्रेडिट कार्ड (KCC), कृषि इनपुट सब्सिडी और अन्य सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए तुरंत पात्र हो गए हैं। प्रथम चरण की इस ऐतिहासिक सफलता के बाद, बस्तर जिला प्रशासन अब इसके अगले चरण की ओर कदम बढ़ा चुका है, जिसके तहत पिछले 10 वर्षों के लंबित मामलों का शत-प्रतिशत सेचुरेशन करने का बड़ा लक्ष्य रखा गया है।

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