तलाक के बाद फिर जागा प्यार: ‘डिक्री’ रद्द कराने कोर्ट पहुंचे पति-पत्नी, हाई कोर्ट का बड़ा फैसला— “कानूनन अब यह संभव नहीं”…NV News

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प्रयागराज। कानून की दुनिया में कभी-कभी ऐसी स्थितियां बन जाती हैं जहाँ भावनाएं और नियम आपस में टकरा जाते हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प और कानूनी रूप से पेचीदा मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट में सामने आया, जहाँ एक दंपति ने तलाक की डिक्री मिलने के बाद फिर से एक होने का फैसला किया। हालांकि, जब वे अपने तलाक को रद्द कराने कोर्ट पहुंचे, तो माननीय कोर्ट ने साफ कह दिया कि तलाक की डिक्री (तलाक का आदेश) जारी होने के बाद उसे वापस लेना कानूनी रूप से संभव नहीं है।

क्या है पूरा मामला?

संबंधित दंपति ने आपसी सहमति (Section 13-B) के आधार पर परिवार न्यायालय (Family Court) से तलाक ले लिया था। तलाक की डिक्री मिलने के कुछ समय बाद दोनों को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने फिर से साथ रहने का निर्णय लिया। इस पुनर्मिलन को आधिकारिक कानूनी मान्यता दिलाने के लिए उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और मांग की कि उनके पुराने तलाक के आदेश को रद्द कर दिया जाए ताकि उनका पिछला विवाह अस्तित्व में बना रहे।

हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

इलाहाबाद हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इस याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि एक बार जब कोर्ट कानून की उचित प्रक्रिया के बाद तलाक की डिक्री पारित कर देता है, तो वह विवाह औपचारिक रूप से समाप्त हो जाता है। कोर्ट ने कहा कि:

तलाक की डिक्री को ‘रद्द’ करने का कोई कानूनी प्रावधान सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) या हिंदू विवाह अधिनियम में इस आधार पर नहीं है कि दंपति अब साथ रहना चाहते हैं।

न्यायालय ने दंपति को सलाह दी कि यदि वे फिर से साथ रहना चाहते हैं, तो वे कानूनी रूप से दोबारा विवाह (Remarriage) कर सकते हैं।

यह फैसला स्पष्ट करता है कि न्यायिक आदेशों की एक गरिमा और औपचारिकता होती है, जिसे केवल आपसी इच्छा के आधार पर पलटा नहीं जा सकता।

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