Women Empowerment – ‘दीदी के बखरी’ से संवर रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था; कांकेर की 3,364 महिलाएं बनीं आत्मनिर्भर, बाड़ी से बढ़ी आमदनी…NV News
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NV News – कांकेर। छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए शुरू की गई ‘दीदी के बखरी’ (बाड़ी) योजना अब महिलाओं के लिए वरदान साबित हो रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की आजीविका को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से संचालित इस पहल के माध्यम से जिले की 3,364 महिलाएं सीधे तौर पर आत्मनिर्भर बन चुकी हैं। अपने ही घर के पिछवाड़े (बखरी) में उन्नत तरीके से साग-भाजी का उत्पादन कर ये महिलाएं न केवल परिवार के पोषण का ध्यान रख रही हैं, बल्कि अतिरिक्त उपज को बाजार में बेचकर अच्छी खासी कमाई भी कर रही हैं।
कांकेर जिले के विभिन्न ब्लॉक में महिला स्व-सहायता समूहों के माध्यम से ‘दीदी के बखरी’ को विकसित किया गया है। प्रशासन द्वारा इन महिलाओं को उन्नत बीज, जैविक खाद और तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान किया गया, जिससे बाड़ियों का उत्पादन कई गुना बढ़ गया है। पहले जो जमीन बेकार पड़ी रहती थी, अब वहां मुनगा, पपीता, बरबट्टी, करेला, मिर्च और अन्य मौसमी सब्जियां लहलहा रही हैं। इससे महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक स्तर में बड़ा बदलाव आया है, और वे अब घर के छोटे-मोटे खर्चों के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं हैं।
योजना की सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उत्पादित सब्जियों को स्थानीय हाट-बाजारों और मध्याह्न भोजन (Mid-day Meal) के लिए स्कूलों व आंगनबाड़ियों में भी सप्लाई किया जा रहा है। इससे महिलाओं को बिचौलियों के बिना अपनी फसल का सही दाम मिल रहा है। ‘दीदी के बखरी’ ने कुपोषण के खिलाफ जंग में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, क्योंकि ग्रामीणों को अब अपने ही घर में ताजी और रसायन मुक्त (Chemical-free) सब्जियां उपलब्ध हो रही हैं।
प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, कांकेर जिले में यह मॉडल ‘नवाचार’ के रूप में उभरा है। महिलाओं का कहना है कि पहले वे केवल खेती-मजदूरी तक सीमित थीं, लेकिन अब खुद की ‘बखरी’ की मालिक बनकर वे सशक्त महसूस कर रही हैं। कई महिलाओं ने तो सब्जी उत्पादन से होने वाली आय से बच्चों की पढ़ाई और घर की मरम्मत जैसे महत्वपूर्ण कार्य भी पूरे किए हैं। यह पहल छत्तीसगढ़ सरकार की ग्रामीण विकास नीति को धरातल पर सफल बनाने का एक उत्कृष्ट उदाहरण पेश कर रही है।
कांकेर की इन 3,364 महिलाओं की सफलता की कहानी अब आस-पास के अन्य जिलों के लिए भी प्रेरणा बन गई है। ‘दीदी के बखरी’ ने सिद्ध कर दिया है कि यदि सही मार्गदर्शन और संसाधन मिलें, तो ग्रामीण महिलाएं भी सफल उद्यमी बन सकती हैं। जिला प्रशासन अब इस योजना का विस्तार करने की तैयारी में है, ताकि आने वाले समय में जिले की हर ग्रामीण महिला आर्थिक रूप से सशक्त हो सके और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अपना सक्रिय योगदान दे सके।
