बस्तर के आदिवासी मनाते हैं गर्मी के दिनों में अनोखा पारंपरिक त्यौहार, जिसमें महिलाएं नहीं होती शामिल , जाने त्यौहार के बारे में

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NV News:-   छत्तीसगढ़ का आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र बस्तर अपनी अनोखी परंपरा, रीति-रिवाज और रहन-सहन के लिए पूरे देश में जाना जाता है. यहां मनाए जाने वाले तीज त्यौहारों की रस्में सबसे अलग होती है. इन त्यौहार में से एक है माटी त्यौहार. चैत्र महीने में गर्मी के दिनों में मनाए जाने वाले इस माटी त्यौहार की अपनी अलग ही और खास परंपरा है. दरअसल बस्तर की माटी को आदिवासी बहुत सम्मान देते हैं. वो ये मानते हैं कि धरती उनका पालन करती है और उनका बोझ उठाने में उसे कोई कष्ट नहीं होता. माता की तरह अनाज देकर धरती उनका पोषण करती है और एक दाने के बदले सैकड़ों दाने लौटाती है.

 

15 दिनों तक मनाया जाता है त्यौहार

बस्तर के जानकार हेमंत कश्यप ने बताया कि बस्तर में आदिवासी समाज मुख्य रूप से खेती किसानी पर आधारित हैं. चैत्र महीने के आरंभ होते ही बस्तर के आदिवासी माटी त्यौहार या बीज पुटनी त्यौहार बड़े धूमधाम के साथ मनाते हैं. यह त्यौहार 15 दिनों से भी अधिक समय तक चलता है. बस्तर के लोगों की सोच है कि जो धरती उनका बोझ उठाती है और शरीर में उत्पन्न गंदगियों को साफ करती है. ऐसे में श्रद्धा स्वरूप उसका आभार भी जरूर व्यक्त किया जाना चाहिए. उन्होंने बताया कि इस माटी त्यौहार के दौरान देवी देवताओं की पूजा के साथ ग्राम देवता को महुए की कच्ची शराब और बकरा, मुर्गा की बलि दी जाती है.

 

कुंवारी और शादीशुदा महिलाएं नहीं होतीं शामिल

इसके साथ ही धरती में बीज बोने के पहले आदिवासी धरती की पूजा अर्चना करते हैं और अपने खेत के लिए बीज धान निकालकर पलाश के पत्तों से पोटली बनाकर रख लेते हैं. इन छोटे-छोटे बीज की पोटली को माटी देवस्थल तक ले जाकर अपने माटी देव की पूजा करते हैं और इस दिन पशुओं का भोजन पकाकर प्रसाद के रूप में बांटते हैं. इस त्यौहार की खास विशेषता यह है कि इस त्यौहार में महिलाओं को त्यौहार में हिस्सा लेने या प्रसाद ग्रहण करने की पूरी तरह से मनाही होती है.

 

त्यौहार की रहती है धूम

वहीं पूजा पाठ के बाद माटी देव स्थान पर छोटा गड्ढा बनाकर उसे पानी से भर दिया जाता है और धान की छोटी-छोटी पोटलियों को पुजारी की गोद में डाल दिया जाता है. ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से खेत में पल्हा और अच्छी फसल होगी और माटी देव उनके फसल की रक्षा करेंगे. इस मौके पर आदिवासी लोक नृत्य और उत्सव की धूम रहती है.

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