जिले में पंचायत फंड का बंदरबांट,सरपंच-सचिव जल्द होंगे बेनक़ाब…NV News

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धमतरी। पंचायतों को मजबूत बनाने और गांवों के विकास कार्यों में पारदर्शिता लाने के लिए केंद्र सरकार ने 15वें वित्त आयोग के तहत राशि जारी की है। नियम यह है कि इस राशि का 60 प्रतिशत उपयोग पेयजल और स्वच्छता पर और 40 प्रतिशत हिस्सा अन्य निर्माण कार्यों पर होना चाहिए। इसके अलावा इस राशि से मानदेय, मुरुम कार्य या बिना स्वीकृत योजना के किसी भी कार्य पर खर्च नहीं किया जा सकता।
लेकिन हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है। धमतरी जिले की कई ग्राम पंचायतों में सरपंच और सचिव मिलकर नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं। पंचायत प्रस्ताव के बिना, फर्जी बिलों के सहारे और कोटेशन के नाम पर मनमानी करके विकास की राशि को निजी स्वार्थ में खर्च किया जा रहा है।
कैसे हो रहा है भ्रष्टाचार?:
जिले की कई पंचायतों का रिकॉर्ड ,जांच में सामने आया कि पंचायतों में महज़ कागज़ों पर विकास कार्य दिखाकर राशि का आहरण किया जा रहा है। जहां कम दाम के सामान खरीदे गए, वहां अधिक कीमत के बिल लगाए गए। कहीं-कहीं तो ऐसे निर्माण कार्यों के भुगतान भी कर दिए गए, जो योजना में शामिल ही नहीं थे।
ग्राम पंचायतों के सचिव और सरपंच की मिलीभगत से नियमों को ताक पर रखकर 15वें वित्त आयोग की राशि का दुरुपयोग किया जा रहा है। यह पैसा गांव की सड़कों, पानी और सफाई जैसी बुनियादी ज़रूरतों पर खर्च होना चाहिए था, लेकिन भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है।
विकास की बजाय धांधली:
केंद्र सरकार का उद्देश्य स्पष्ट था कि,पारदर्शिता और जवाबदेही। ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम की व्यवस्था भी इसी सोच का हिस्सा है ताकि आम जनता को पता चले कि किस काम में कितना खर्च हुआ। लेकिन गांव के लोग अब भी अंधेरे में हैं। कागज़ों पर तो योजनाएं पूरी दिखाई जाती हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत में विकास नज़र नहीं आता।
धमतरी के कई ग्रामीणों ने इस बात पर नाराज़गी जताई कि पंचायत के फंड से न तो पानी की सही व्यवस्था हो रही है और न ही सफाई की। दूसरी ओर सरपंच-सचिव महंगे बिल लगाकर राशि हड़पने में व्यस्त हैं।
नियमों को अनदेखा करने की प्रवृत्ति:
15वें वित्त आयोग के दिशा-निर्देश साफ कहते हैं कि राशि से वेतन-भत्ता, मुरुम डलवाने का खर्च या गैर-स्वीकृत कार्यों का भुगतान नहीं होगा। इसके बावजूद पंचायतों में ऐसे-ऐसे बिल पास किए गए हैं, जिनका ज़िक्र तक पंचायत की कार्ययोजना में नहीं है। इससे साफ है कि अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की मिलीभगत से नियमों की अवहेलना हो रही है।
गांवों के विकास पर असर:
ग्राम पंचायतों को दिया गया फंड गांव के बुनियादी ढांचे को मज़बूत करने के लिए होता है। यदि यह राशि सही दिशा में खर्च हो तो गांव की तस्वीर बदल सकती है। बेहतर सड़कें, स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता और छोटे-छोटे निर्माण कार्य ग्रामीणों की जिंदगी आसान बना सकते हैं।
लेकिन भ्रष्टाचार के कारण यह राशि आमजन तक पहुंचने के बजाय निजी जेबों में जा रही है। नतीजा यह है कि ग्रामीणों को विकास का लाभ नहीं मिल रहा और उनकी परेशानियां जस की तस बनी हुई हैं।
जनता की उम्मीदें:
ग्रामीणों को अब जिला प्रशासन और सरकार से उम्मीद है कि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी। अगर इस मामले में सख्त कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में भी पंचायतों में इसी तरह गड़बड़ी होती रहेगी।
गांव के बुजुर्गों का कहना है कि जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी और भ्रष्ट अधिकारियों-सचिवों पर कड़ी सज़ा नहीं होगी, तब तक केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ जनता तक नहीं पहुंचेगा।