चमत्कार या अटूट विश्वास! अंबिकापुर में दहकते अंगारों पर ‘अग्निपथ’ की रस्म, बिना जले आग से गुजरते हैं ग्रामीण…NV News

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छत्तीसगढ़ का सरगुजा संभाग अपनी रहस्यमयी और प्राचीन परंपराओं के लिए जाना जाता है। इसी अंचल के अंबिकापुर क्षेत्र में होली के दौरान एक ऐसी रस्म निभाई जाती है, जो रोंगटे खड़े कर देती है। यहाँ होलिका दहन के तुरंत बाद, जब आग की लपटें शांत होकर दहकते हुए लाल अंगारों का रूप ले लेती हैं, तब ग्रामीण उन पर नंगे पैर चलते हैं। यह ‘अग्नि स्नान’ देखने के लिए हजारों की भीड़ उमड़ती है, जो इस हैरतअंगेज दृश्य को देखकर दांतों तले उंगलियां दबा लेती है।

इस परंपरा की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि धधकते कोयलों पर चलने के बावजूद किसी भी ग्रामीण के पांव में न तो जलन होती है और न ही छाले पड़ते हैं। स्थानीय निवासियों का मानना है कि यह उनकी कुल देवी और होलिका माता के प्रति अटूट श्रद्धा का परिणाम है। ग्रामीणों के अनुसार, जो भी व्यक्ति शुद्ध मन से उपवास रखकर इन अंगारों से गुजरता है, उसे अग्नि स्पर्श नहीं करती। विज्ञान जहाँ इसे ‘थर्मल कंडक्टिविटी’ या विशेष तकनीक कह सकता है, वहीं ग्रामीणों के लिए यह पूरी तरह से ईश्वरीय चमत्कार है।

मान्यता है कि इस ‘अग्निपथ’ से गुजरने से गांव पर आने वाली प्राकृतिक आपदाएं टल जाती हैं और फसलें अच्छी होती हैं। परंपरा के अनुसार, गांव के बैगा (पुजारी) सबसे पहले अंगारों पर कदम रखते हैं, जिसके बाद अन्य ग्रामीण जयकारे लगाते हुए उनके पीछे चलते हैं। ढोल-नगाड़ों की थाप और भक्तिमय माहौल के बीच यह रस्म पूरी की जाती है। इस दौरान न तो किसी सुरक्षा उपकरण का उपयोग किया जाता है और न ही कोई दवा लगाई जाती है, फिर भी हर साल यह आयोजन बिना किसी दुर्घटना के संपन्न होता है।

आज के आधुनिक युग में भी सरगुजा की यह परंपरा अपनी जड़ें जमाए हुए है। अंबिकापुर की यह ‘अनोखी होली’ अब केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रही, बल्कि देश-दुनिया के पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन गई है। आस्था और साहस का यह संगम यह संदेश देता है कि विश्वास की शक्ति बड़ी से बड़ी बाधा को पार करने की क्षमता रखती है। यह रस्म न केवल साहस का प्रतीक है, बल्कि सरगुजा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखे हुए है।

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