Mahanadi Water Dispute: दो राज्यों की जंग ट्रिब्यूनल की दहलीज पर…NV News

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रायपुर/(Mahanadi Water Dispute): छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच महानदी जल बंटवारे को लेकर दशकों से चला आ रहा विवाद एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर पहुंचते–पहुंचते रुक गया है। गर्मियों में जल उपलब्धता कम होने का हवाला देते हुए, छत्तीसगढ़ ने ओडिशा की अतिरिक्त पानी की मांग को अस्वीकार कर दिया है, जिसके बाद महानदी जल विवाद ट्रिब्यूनल ने दोनों राज्यों को आपसी समाधान निकालने के लिए एक और मौका देते हुए अगली सुनवाई 20 दिसंबर को तय की है।

ट्रिब्यूनल में गर्मागर्म बहस, लेकिन निष्कर्ष नहीं:

हाल ही में हुई सुनवाई में दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क रखे। छत्तीसगढ़ ने कहा कि,मई–जून में महानदी में स्वाभाविक रूप से जल स्तर गिर जाता है, ऐसे में ओडिशा को अतिरिक्त पानी देना व्यावहारिक नहीं है। अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट कहा कि,राज्य अपने निर्धारित हिस्से के भीतर ही जल का उपयोग कर रहा है।

दूसरी ओर ओडिशा ने आरोप दोहराए कि,छत्तीसगढ़ की ओर से बनाए गए बैराजों ने हीराकुंड बांध में प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित किया है, जिससे गर्मियों में वहां की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो रहा है। दोनों राज्यों की दलीलें सुनने के बाद ट्रिब्यूनल, जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त जज बेला त्रिवेदी ने कहा कि,अंतिम निर्णय से पहले राज्यों को एक बार और बातचीत का अवसर दिया जाएगा।

टेक्निकल कमेटी पर बड़ी जिम्मेदारी:

मर्यादित समय में समाधान निकालने की जिम्मेदारी अब दोनों राज्यों की तकनीकी विशेषज्ञ समितियों पर है। यह कमेटी गर्मियों के दौरान नदी में वास्तविक जल उपलब्धता का पुनर्मूल्यांकन करेगी और 20 दिसंबर से पहले संभावित समझौते का आधार तैयार करने की कोशिश करेगी। समिति पहले ही बेसिन का दौरा कर चुकी है, लेकिन कई तकनीकी पहलुओं पर अब भी समन्वय की जरूरत है।

मुख्यमंत्रियों की बैठक भी नहीं निकाल सकी हल:

राजनीतिक स्तर पर भी समाधान की उम्मीदें जगाई गई थीं। हाल ही में दिल्ली में छत्तीसगढ़ के सीएम विष्णु देव साय और ओडिशा के सीएम मोहनचरण मांझी के बीच हुई बैठक में आपसी सहमति का माहौल दिखाई दिया था। बैठक में दोनों ने बेसिन क्षेत्र में चल रहे निर्माणाधीन प्रोजेक्टों को पूरा करने पर सहमति जताई थी। यह एक सकारात्मक संकेत माना गया, लेकिन जल बंटवारे का मूल विवाद जस का तस बना हुआ है।

विश्लेषकों का मानना है कि,दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार होने से समन्वय की प्रक्रिया पहले की तुलना में सरल हो सकती है। इसी आशा में अगस्त 2025 में दोनों राज्यों के मुख्य सचिवों और जल संसाधन सचिवों के स्तर पर महत्वपूर्ण बैठकें भी हुई थीं। इन बैठकों में दिसंबर 2025 तक समाधान का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन अब सभी की नजरें ट्रिब्यूनल की 20 दिसंबर की सुनवाई पर टिक गई हैं।

विवाद की जड़ में 40 साल पुरानी खींचतान:

महानदी जल विवाद की शुरुआत 1983 में हुई थी, जब ओडिशा ने आरोप लगाया कि,छत्तीसगढ़ अपनी सीमा में बैराज और बांध बनाकर नदी के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित कर रहा है। विशेष रूप से रुद्री बैराज और गंगरेल बांध को लेकर ओडिशा आपत्ति जताता रहा है। ओडिशा का कहना है कि, इससे हीराकुंड बांध को निर्धारित मात्रा में पानी नहीं मिल पाता।छत्तीसगढ़ इन आरोपों को खारिज करते हुए दावा करता है कि,वह अपने हिस्से के पानी का ही उपयोग करता हैं।

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