हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: जेल प्रहरी की बर्खास्तगी रद्द; केवल सोशल मीडिया वीडियो के आधार पर नहीं हो सकती ऐसी कठोर कार्रवाई…NV News

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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने शासकीय कर्मचारियों के सोशल मीडिया उपयोग और उनके खिलाफ होने वाली दंडात्मक कार्रवाई को लेकर एक नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। कोर्ट ने एक जेल प्रहरी की बर्खास्तगी के आदेश को अवैध मानते हुए उसे रद्द कर दिया है। बता दें कि संबंधित कर्मचारी को सोशल मीडिया पर एक वीडियो अपलोड करने के कारण सेवा से बाहर कर दिया गया था, जिसे कोर्ट ने प्राकृतिक न्याय और सेवा नियमों के विपरीत माना है।

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति की पीठ ने पाया कि विभाग द्वारा की गई कार्रवाई ‘आनुपातिकता के सिद्धांत’ (Principle of Proportionality) का उल्लंघन करती है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी कर्मचारी द्वारा सोशल मीडिया पर वीडियो साझा करना या अपने विचार व्यक्त करना, जब तक कि वह विभाग की छवि को गंभीर रूप से धूमिल न करे या अनुशासनहीनता की श्रेणी में न आए, सीधे बर्खास्तगी का आधार नहीं बन सकता।

याचिकाकर्ता (जेल प्रहरी) की ओर से तर्क दिया गया था कि वीडियो में कोई ऐसी आपत्तिजनक सामग्री नहीं थी जो राज्य की सुरक्षा या जेल प्रशासन के गोपनीय नियमों का उल्लंघन करती हो। विभाग ने बिना विस्तृत जांच और कर्मचारी का पक्ष ठीक से सुने ही उसे सेवा से पृथक करने का कठोर निर्णय ले लिया था। हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए विभागीय जांच की कमियों को रेखांकित किया।

हाई कोर्ट के इस फैसले से राज्य के हजारों सरकारी कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है, जो अक्सर सोशल मीडिया पर अपनी सक्रियता को लेकर विभागीय कार्रवाई के डर में रहते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुशासन बनाए रखना जरूरी है, लेकिन सजा अपराध की गंभीरता के अनुरूप होनी चाहिए। केवल एक वीडियो पोस्ट करने पर आजीविका छीन लेना एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनुचित है।

इस आदेश के बाद अब जेल विभाग को संबंधित प्रहरी को सेवा में बहाल करना होगा। साथ ही, कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि विभाग को लगता है कि नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो वह नियमानुसार कम गंभीर दंड पर विचार कर सकता है, लेकिन बर्खास्तगी जैसा कदम कानूनन टिकने योग्य नहीं है। यह फैसला भविष्य में सोशल मीडिया से जुड़े विभागीय मामलों के लिए एक कानूनी गाइडलाइन का काम करेगा।

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