‘बुलडोजर से विरासत नहीं बचाई जाती!’ काशी की गलियों में मचे कोहराम पर भड़के अखिलेश, योगी सरकार को दी नसीहत… NV News
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उत्तर प्रदेश: वाराणसी के ऐतिहासिक मणिकर्णिका घाट और दालमंडी क्षेत्र में चल रहे ध्वस्तीकरण अभियान ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में उबाल ला दिया है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने योगी सरकार की ‘बुलडोजर नीति’ पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि धरोहरें तोड़ी नहीं, बल्कि संजोयी जाती हैं। अखिलेश ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए आरोप लगाया कि विकास के नाम पर काशी की पौराणिक आत्मा और उसकी ऐतिहासिक पहचान को बेरहमी से मिटाया जा रहा है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जो सरकार अपनी विरासत का सम्मान नहीं कर सकती, वह संस्कृति की रक्षक कभी नहीं हो सकती।
मणिकर्णिका घाट के पुनरुद्धार और दालमंडी में सड़कों के चौड़ीकरण के लिए प्रशासन द्वारा पुरानी इमारतों को गिराया जा रहा है, जिसका स्थानीय लोग और व्यापारी कड़ा विरोध कर रहे हैं। अखिलेश यादव ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि बनारस अपनी संकरी गलियों और प्राचीन स्थापत्य के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है, लेकिन ‘स्मार्ट सिटी’ की अंधी दौड़ में सदियों पुराने इतिहास को मलबे में तब्दील किया जा रहा है। उन्होंने मांग की कि सरकार को तुरंत इस कार्रवाई पर रोक लगानी चाहिए और स्थानीय लोगों की सहमति से संरक्षण की योजना बनानी चाहिए।
विपक्ष का आरोप है कि इस अभियान से न केवल शहर का सांस्कृतिक ढांचा प्रभावित हो रहा है, बल्कि हजारों छोटे व्यापारियों और बुनकरों की रोजी-रोटी पर भी संकट खड़ा हो गया है। दालमंडी इलाके में व्यापारियों ने अपनी दुकानों के बाहर पोस्टर लगाकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। अखिलेश यादव ने तंज कसते हुए कहा कि यह कैसा विकास है जो लोगों को बेघर और बेरोजगार कर दे? उन्होंने सरकार को याद दिलाया कि बनारस की पहचान कंक्रीट के जंगलों से नहीं, बल्कि वहां की जीवंत विरासत और प्राचीन मंदिरों से है।
प्रशासन का तर्क है कि मणिकर्णिका घाट पर सुविधाओं के विस्तार से श्रद्धालुओं को आसानी होगी, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे ‘बुलडोजर संस्कृति’ बनाम ‘विरासत संरक्षण’ की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में अखिलेश यादव की यह मुखरता सीधे तौर पर बीजेपी के विकास मॉडल पर सवाल खड़े कर रही है। आने वाले दिनों में यह विवाद और गहरा सकता है क्योंकि स्थानीय निवासी अपनी पूर्वजों की संपत्तियों को बचाने के लिए कानूनी और सामाजिक स्तर पर लामबंद हो रहे हैं।
