‘जो नहीं भोलेनाथ का, वो नहीं हमारी जात का’: डीलिस्टिंग कानून के लिए जनजातीय समाज ने भरी हुंकार…NV News
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बेमेतरा | छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले में जनजातीय सुरक्षा मंच के बैनर तले एक विशाल ‘गर्जना महारैली’ का आयोजन किया गया। इस रैली में हज़ारों की संख्या में जनजातीय समाज के लोग जुटे और ‘डीलिस्टिंग’ (Delisting) कानून को जल्द से जल्द लागू करने की मांग की। रैली के दौरान मंच से दिया गया नारा— “जो नहीं भोलेनाथ का, वो नहीं हमारी जात का” — पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।
क्या है ‘डीलिस्टिंग’ की मांग?
जनजातीय समाज का तर्क है कि जो आदिवासी अपना मूल धर्म और संस्कृति त्याग कर दूसरा धर्म (ईसाई या इस्लाम) अपना चुके हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची से बाहर किया जाना चाहिए। समाज के नेताओं का कहना है:
दोहरे लाभ पर रोक: धर्म परिवर्तन करने वाले लोग अल्पसंख्यक होने का लाभ भी लेते हैं और आदिवासी कोटे से आरक्षण व अन्य सरकारी सुविधाओं का भी फायदा उठाते हैं। इसे खत्म किया जाना चाहिए।
संस्कृति की रक्षा: वक्ताओं ने कहा कि हमारी पहचान हमारी परंपराओं और देव-स्थलों से है। जो लोग हमारे पूर्वजों और देवी-देवताओं को नहीं मानते, वे आदिवासी कहलाने के हकदार नहीं हैं।
कार्तिक उरांव के संघर्ष का जिक्र
रैली में पूर्व सांसद दिवंगत कार्तिक उरांव के संघर्षों को याद किया गया, जिन्होंने दशकों पहले संसद में डीलिस्टिंग का मुद्दा उठाया था। समाज के प्रमुखों ने चेतावनी दी कि यदि केंद्र सरकार ने संविधान में संशोधन कर डीलिस्टिंग कानून नहीं बनाया, तो यह आंदोलन और भी उग्र रूप लेगा।
राजनीतिक गलियारों में हलचल
छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण और डीलिस्टिंग एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। इस महारैली के माध्यम से जनजातीय समाज ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वे अपनी पहचान और अधिकारों की रक्षा के लिए अब पीछे नहीं हटेंगे। रैली में पारंपरिक हथियारों और वाद्य यंत्रों के साथ समाज के लोगों ने शक्ति प्रदर्शन किया।
