गबन डाक बाबू का, सजा विभाग को: उपभोक्ता आयोग ने दिया निवेशकों का पैसा लौटाने का आदेश, करोड़ों की देनदारी से फूले विभाग के हाथ-पांव…
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राजधानी रायपुर के पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय (रविवि) स्थित डाकघर में हुए करोड़ों रुपये के गबन ने अब एक विकराल रूप ले लिया है। शुरुआती जांच में जो गबन कुछ करोड़ों का लग रहा था, उसका आंकड़ा अब 20 करोड़ रुपये को पार कर चुका है। इस घोटाले ने उन सैकड़ों मध्यमवर्गीय परिवारों और सेवानिवृत्त कर्मचारियों की कमर तोड़ दी है, जिन्होंने अपनी जीवन भर की कमाई डाकघर की योजनाओं में सुरक्षित समझकर निवेश की थी। अब इस मामले में उपभोक्ता आयोग के एक क्रांतिकारी फैसले ने डाक विभाग की नींद उड़ा दी है, जिसमें विभाग को निवेशकों की राशि ब्याज सहित लौटाने का निर्देश दिया गया है।
घोटाले की कार्यप्रणाली बेहद शातिर थी, जहां डाकघर के ही कर्मचारियों ने उपभोक्ताओं की पासबुक में एंट्री तो की, लेकिन वह राशि सरकारी खाते में जमा ही नहीं की। जब निवेशकों को अपनी जमा राशि की जरूरत पड़ी, तब इस महाघोटाले का भंडाफोड़ हुआ। अब तक 400 से अधिक उपभोक्ताओं ने पुलिस और प्रशासन के पास अपनी शिकायतें दर्ज कराई हैं। उपभोक्ता आयोग ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि कर्मचारी की धोखाधड़ी के लिए विभाग अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता, क्योंकि जनता ने ‘डाक विभाग’ पर भरोसा करके पैसा निवेश किया था, न कि किसी व्यक्ति विशेष पर।
आयोग के इस फैसले के बाद डाक विभाग में हड़कंप की स्थिति है, क्योंकि विभाग अब तक ‘जांच जारी है’ का हवाला देकर भुगतान टाल रहा था। इस आदेश के बाद अब विभाग को करोड़ों रुपये की देनदारी चुकानी होगी, जिसमें मूल राशि के साथ-साथ हर्जाना और ब्याज भी शामिल है। कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला उन सभी पीड़ितों के लिए एक नजीर बनेगा, जो विभागीय अधिकारियों के चक्कर काटकर थक चुके थे। पुलिस इस मामले में मुख्य आरोपी डाक बाबू और उसके सहयोगियों के खिलाफ पहले ही कार्रवाई कर चुकी है, लेकिन पैसे की रिकवरी अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
इस घोटाले ने सरकारी संस्थानों की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या डिजिटलीकरण के दौर में भी पासबुक की एंट्री और सिस्टम के डेटा में इतना बड़ा अंतर संभव है? फिलहाल, उपभोक्ता आयोग के फैसले से पीड़ितों में न्याय की उम्मीद जागी है। अब देखना यह होगा कि डाक विभाग इस भारी-भरकम राशि का भुगतान कब तक करता है या इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देता है।
