छत्तीसगढ़ के थानों में सजीं ‘अदालतें’: मजिस्ट्रेट की भूमिका में दिखे पुलिस कप्तान, काले कोट में SP ने निपटाए लंबित मामले…NV News
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छत्तीसगढ़ के पुलिस थानों में आज एक अनोखा नजारा देखने को मिला, जहाँ खाकी वर्दी की जगह ‘काला कोट’ और दंड के बजाय ‘न्याय’ का माहौल नजर आया। प्रदेश के विभिन्न थानों में कार्यपालक दंडाधिकारी (Executive Magistrate) की शक्तियों का प्रयोग करते हुए पुलिस अधीक्षक (SP) और अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने अदालतें लगाईं। इस विशेष पहल के तहत एसपी स्वयं दंडाधिकारी की भूमिका में नजर आए, जिससे थानों का माहौल किसी कोर्ट रूम जैसा प्रतीत होने लगा। इस दौरान धारा 107, 116 और 151 जैसे प्रतिबंधात्मक मामलों की त्वरित सुनवाई कर सैकड़ों लंबित प्रकरणों का निराकरण किया गया।
इस ‘थाना अदालत’ का मुख्य उद्देश्य छोटे-मोटे विवादों और प्रतिबंधात्मक मामलों के बोझ को कम करना तथा न्याय प्रक्रिया को आम जनता के करीब लाना है। अक्सर छोटे विवादों के लिए लोगों को तहसील या जिला न्यायालय के चक्कर काटने पड़ते थे, लेकिन इस पहल से थानों में ही मौके पर सुनवाई कर शांति व्यवस्था बनाए रखने हेतु बांड भरवाए गए। एसपी ने न केवल मामलों की सुनवाई की, बल्कि पक्षकारों को आपसी भाईचारे और कानून के दायरे में रहने की समझाइश भी दी।
इस दौरान एसपी ने थानों के रिकॉर्ड का अवलोकन किया और लंबित अपराधों की समीक्षा भी की। उन्होंने अधीनस्थ अधिकारियों को कड़े निर्देश दिए कि प्रतिबंधात्मक कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि समाज में इसका स्पष्ट असर दिखना चाहिए। काले कोट में दंडाधिकारी की शक्तियों का निर्वहन करते हुए पुलिस कप्तान ने यह संदेश दिया कि पुलिस केवल अपराधियों को पकड़ने के लिए नहीं, बल्कि न्याय की रक्षा और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए भी उतनी ही प्रतिबद्ध है।
प्रदेश स्तर पर चलाई जा रही इस मुहिम की आम जनता और विधिक विशेषज्ञों ने सराहना की है। जानकारों का मानना है कि इससे न केवल पुलिस और जनता के बीच की दूरी कम होगी, बल्कि अदालतों पर बढ़ते केसों के बोझ में भी कमी आएगी। मुख्यमंत्री और गृह मंत्री के निर्देशों के तहत शुरू की गई इस “पुलिस अदालत” की सफलता को देखते हुए इसे नियमित रूप से आयोजित करने की योजना बनाई जा रही है।
