CGPSC Scam : HC का बड़ा फैसला, निर्दोष चयनितों की नियुक्ति पर लगी मुहर…NV News
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रायपुर/(CGPSC Scam): छत्तीसगढ़ की बहुचर्चित राज्य सेवा परीक्षा घोटाले से जुड़े मामले में गुरुवार को हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया, जिसने राज्य सरकार की पूरी दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट के इस आदेश ने उन दर्जनों अभ्यर्थियों के चेहरे पर उम्मीद की रोशनी वापस लौटा दी है जो पिछले दो साल से अपनी नियुक्ति का इंतज़ार कर रहे थे। हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि,जिन उम्मीदवारों के नाम सीबीआई की चार्जशीट में नहीं हैं, उन्हें नियुक्ति देने में कोई कानूनी बाधा नहीं है। इसके साथ ही डीएसपी और डिप्टी कलेक्टर जैसे प्रतिष्ठित पदों पर चयनित अभ्यर्थियों की ज्वाइनिंग का रास्ता फिर से खुल गया है।
दरअसल,यह पूरा मामला वर्ष 2021–22 की राज्य सेवा परीक्षा से जुड़ा है। छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग ने उस समय 171 पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया आयोजित की थी। परिणाम जारी होने के बाद यह आरोप सामने आए कि,कुछ उम्मीदवारों को राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक अधिकारियों के रिश्तों के आधार पर अनुचित लाभ दिया गया। इन आरोपों ने न केवल चयनित अभ्यर्थियों को संदेह के घेरे में डाल दिया, बल्कि पूरी चयन प्रक्रिया को विवादों में धकेल दिया। बढ़ते दबाव और शिकायतों को देखते हुए राज्य सरकार ने जांच का आदेश दिया, जिसके बाद मामला सीबीआई तक पहुंचा।
सीबीआई ने जांच के दौरान कई अनियमितताओं पर प्रकाश डाला और कथित घोटाले में शामिल सात लोगों को गिरफ्तार भी किया। हालांकि, जांच में यह भी सामने आया कि,कई चयनित अभ्यर्थियों का इस कथित अनियमितता से कोई लेना-देना नहीं था। इसके बावजूद सरकार ने घोटाले की आशंका का हवाला देते हुए उन सभी चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्ति रोक दी, जिनकी सूची पहले ही जारी हो चुकी थी। यही रोक बाद में इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा बन गई।
सरकार के इस निर्णय के विरोध में प्रभावित अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनके वकीलों- सीनियर एडवोकेट राजीव श्रीवास्तव और मलय श्रीवास्तव- ने दलील दी कि, किसी भी उम्मीदवार को बिना ठोस आरोप और चार्जशीट में नाम शामिल हुए दंडित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए सिंगल बेंच में आदेश दिया कि जिन अभ्यर्थियों के खिलाफ किसी भी प्रकार की आपराधिक कार्रवाई लंबित नहीं है, उन्हें नियुक्ति दी जाए।
इसके बाद राज्य सरकार ने सिंगल बेंच के इस फैसले को चुनौती देते हुए चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच में अपील दायर की। सरकार ने तर्क दिया कि, जब तक पूरे मामले की जांच पूरी तरह समाप्त न हो जाए, तब तक नियुक्तियां रोक कर रखना आवश्यक है, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की परेशानी न हो। लेकिन आज डिवीजन बेंच ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए सरकार की अपील खारिज कर दी और सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखा।
हाईकोर्ट ने कहा कि, जिन अभ्यर्थियों पर कोई आरोप तय नहीं हुआ है, उन्हें केवल संदेह के आधार पर नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। संविधान ऐसे किसी भी प्रशासनिक निर्णय की अनुमति नहीं देता जो बिना सबूत के किसी व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि, जांच एजेंसियों की ओर से नाम शामिल न होने का अर्थ है कि उन अभ्यर्थियों पर कोई संदेह नहीं बचता।
इस फैसले के बाद राज्य सरकार के पास एकमात्र विकल्प अब सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का रह गया है। हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि, हाईकोर्ट का यह निर्णय बहुत स्पष्ट और तार्किक है, इसलिए इसे चुनौती देना सरकार के लिए कठिन साबित हो सकता है। दूसरी ओर, चयनित अभ्यर्थियों और उनके परिवारों में उत्साह है। लंबे समय से नियुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे इन युवाओं के लिए यह फैसला एक बड़ी राहत लेकर आया है।
फिलहाल सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हुई हैं कि, सरकार सुप्रीम कोर्ट का रुख करेगी या हाईकोर्ट के आदेशानुसार चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्ति प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
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