CG Bond Policy: NOC के लिए जमीन गिरवी? डॉक्टर बोले – HC में देंगे चुनौती…NV News 

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रायपुर/(CG Bond Policy): राज्य में मेडिकल शिक्षा से जुड़े हजारों विद्यार्थियों और डॉक्टरों में बांड नीति को लेकर गहरी नाराजगी है। भूपेश बघेल सरकार के दौरान वर्ष 2020 में लागू की गई बांड व्यवस्था- जिसमें एनओसी के लिए 25 से 50 लाख रुपये या जमीन गिरवी रखने की शर्त शामिल है,अब बड़े विवाद का विषय बन गई है। डॉक्टरों का कहना है कि,यह नीति न सिर्फ अव्यावहारिक है, बल्कि आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के भविष्य को सीधे प्रभावित करती है। इसी के विरोध में अब लगभग 70 मेडिकल विद्यार्थी कानूनी लड़ाई की तैयारी में जुटे हैं और जल्द ही हाई कोर्ट में याचिका दायर करने वाले हैं।

क्या है मामला:

छत्तीसगढ़ में एमबीबीएस या पीजी पूरा करने वाले डॉक्टरों के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में अनिवार्य सेवा देना जरूरी है। पहले इसकी शर्तें सामान्य बांड और एफिडेविट तक सीमित थीं, जिसमें छात्र यह लिखकर देते थे कि, उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद वे अपनी शेष सेवा देंगे। लेकिन 2020 में जारी नए आदेश में एनओसी प्राप्त करने के लिए भारी-भरकम बांड राशि जमा करने या जमीन-बिल्डिंग गिरवी रखने का प्रावधान जोड़ दिया गया।

पीजी और सुपर स्पेशियलिटी कोर्स के लिए यह बांड 50 लाख तक है। कई विद्यार्थी बताते हैं कि, इतनी राशि जुटाना लगभग असंभव है, जिसके कारण हर साल कई छात्र उच्च शिक्षा के अवसर से वंचित रह जाते हैं। मजबूरी में कुछ छात्र अपनी पारिवारिक जमीन गिरवी रखकर आगे की पढ़ाई करते हैं।

जमीन गिरवी रखने को लेकर सबसे ज्यादा विरोध:

नए आदेश में कहा गया है कि, यदि अभ्यर्थी बांड राशि न भर सके तो उसे अपनी अचल संपत्ति कलेक्टर कार्यालय के माध्यम से बंधक रखनी होगी। यह तब तक राजस्व अभिलेखों में दर्ज रहेगी जब तक डॉक्टर ग्रामीण सेवा पूरी न कर ले। इस अवधि में वह जमीन बेच भी नहीं सकता। छात्रों का तर्क है कि, यह प्रावधान बंधक की प्रक्रिया को गैर-जरूरी रूप से जटिल और तनावपूर्ण बनाता है, जिससे मध्यमवर्गीय परिवारों पर भारी आर्थिक दबाव पड़ता है।

सूचना का अधिकार में भी नहीं मिली जानकारी:

विद्यार्थियों ने आरटीआई के तहत चिकित्सा शिक्षा विभाग से पूछा था कि, बांड राशि किस आधार पर तय हुई, कितने दौर की फाइलिंग हुई और किन-किन अधिकारियों ने इसे मंजूरी दी। लेकिन विभाग ने जवाब में कहा कि, रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। छात्रों का कहना है कि, यह पारदर्शिता की कमी दिखाता है और नीति की वैधता पर सवाल खड़े करता है।

अन्य राज्यों की तुलना:

• छत्तीसगढ़ में लागू बांड नीति देश में सबसे कठिन मानी जा रही है।

• मध्य प्रदेश में ग्रामीण सेवा का बांड केवल 10 लाख रुपये है।

• महाराष्ट्र में एमबीबीएस के लिए 10 और एमडी-एमएस के लिए 40 लाख का बांड है।

• ओडिशा में एमबीबीएस पर कोई बांड नहीं, सिर्फ एमडी-एमएस पर दो साल सेवा और 10 लाख का प्रावधान है।

विद्यार्थियों का कहना है कि, छत्तीसगढ़ की तुलना में इन राज्यों की नीतियां ज्यादा न्यायसंगत और व्यवहारिक हैं।

सरकार का रुख:

स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने कहा कि,बांड नीति का विस्तृत अध्ययन कराया जा रहा है, और विसंगतियां दूर की जाएंगी। उन्होंने आश्वासन दिया है कि,छात्रों को राहत देने पर जल्द निर्णय लिया जाएगा। हालांकि अभी तक कोई आधिकारिक संशोधन जारी नहीं हुआ है, जिससे छात्रों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।

डॉक्टर संगठनों की प्रतिक्रिया:

जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. रेशम सिंह ने कहा कि, एमबीबीएस के लिए 25 लाख और पीजी के लिए 50 लाख का बांड न केवल अनुचित बल्कि मेडिकल छात्रों के करियर विकास में बाधक है। इसे या तो समाप्त किया जाए या व्यावहारिक सीमा तक कम किया जाए, ताकि छात्र बिना भय और आर्थिक दबाव के पढ़ाई कर सकें।

छत्तीसगढ़ डॉक्टर्स फेडरेशन के अध्यक्ष डॉ. हीरा सिंह लोधी ने कहा कि, सरकार से कई दौर की चर्चा और ज्ञापन के बाद भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इसलिए हाई कोर्ट में चुनौती देना छात्रों का अंतिम विकल्प बन गया है।

आगामी कदम:

सभी छात्र एक समूह के रूप में अधिवक्ताओं से सलाह लेकर याचिका तैयार कर रहे हैं। उनका कहना है कि, सरकारी व्यवस्था की कमियों का बोझ छात्रों पर डालना न्यायसंगत नहीं है। हाई कोर्ट में वे न केवल बांड राशि कम करने बल्कि जमीन गिरवी की शर्त को पूरी तरह समाप्त करने की मांग करेंगे।

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