बस्तर: कैसे बना माओवाद का नया ‘गढ़’ और तेलंगाना का विकल्प?…NV News
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आंध्र प्रदेश के ‘पीपुल्स वॉर ग्रुप’ (PWG) और बिहार के ‘माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर’ (MCC) के 2004 में विलय के बाद भाकपा (माओवादी) का जन्म हुआ। शुरुआती दौर में अविभाजित आंध्र प्रदेश का ‘नल्लामाला’ जंगल माओवादियों का मुख्य केंद्र था। हालांकि, आंध्र प्रदेश पुलिस की विशेष इकाई ‘ग्रेहाउंड्स’ (Greyhounds) के आक्रामक अभियानों और सटीक खुफिया तंत्र ने माओवादियों की कमर तोड़ दी। कड़े दबाव के चलते माओवादी नेतृत्व को एक ऐसे सुरक्षित ठिकाने की तलाश थी जहाँ भौगोलिक स्थिति उनकी गुरिल्ला युद्ध शैली (Guerrilla Warfare) के अनुकूल हो।
बस्तर का ‘अबूझमाड़’ क्षेत्र माओवादियों के लिए वरदान साबित हुआ। लगभग 4,000 वर्ग किलोमीटर में फैला यह इलाका इतना घना और दुर्गम है कि दशकों तक यहाँ का आधिकारिक सर्वेक्षण भी नहीं हो पाया था। तेलंगाना की तुलना में बस्तर की भौगोलिक बनावट (Terrain) अधिक जटिल है, जो माओवादियों को ‘होम एडवांटेज’ देती है। यहाँ की पहाड़ियां, घने जंगल और इंद्रावती जैसी नदियां सुरक्षा बलों के मूवमेंट को धीमा कर देती हैं, जिससे माओवादियों को भागने या छिपने का पर्याप्त समय मिल जाता है।
रणनीतिक रूप से बस्तर का स्थान बेहद महत्वपूर्ण है। यह इलाका छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की सीमाओं को छूता है। इस ‘ट्राई-जंक्शन’ का फायदा उठाकर माओवादी एक राज्य में कार्रवाई करने के बाद दूसरे राज्य की सीमा में प्रवेश कर जाते थे, जिससे अंतर-राज्यीय समन्वय (Inter-state coordination) की कमी के कारण वे बच निकलते थे। इसके अलावा, बस्तर के आदिवासियों के बीच पैठ बनाने के लिए माओवादियों ने जल-जंगल-जमीन के मुद्दों को ढाल बनाया और स्थानीय भाषा ‘गोंडी’ और ‘हलबी’ के जरिए अपनी जड़ें गहरी कर लीं।
आज बस्तर न केवल माओवादियों का सैन्य मुख्यालय है, बल्कि उनकी ‘दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी’ (DKSZC) का सबसे मजबूत आधार भी है। तेलंगाना में शहरीकरण और बेहतर सड़क नेटवर्क ने माओवादियों की गतिविधियों को सीमित कर दिया, जबकि बस्तर में विकास की धीमी गति और सड़कों का अभाव उनके अस्तित्व के लिए ऑक्सीजन का काम करता रहा। हालांकि, हाल के वर्षों में सुरक्षा बलों के ‘फॉरवर्ड कैंप’ और सड़कों के जाल ने माओवादियों के इस सुरक्षित किले में सेंध लगानी शुरू कर दी है।
