बस्तर दशहरा: रहस्यमयी निशा जात्रा, जब आधी रात को गूंजते हैं मंत्र…NV News
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जगदलपुर/(Bastar Dussehra):बस्तर दशहरे की पहचान सिर्फ 75 दिनों तक चलने वाले उत्सव से नहीं, बल्कि उन अनोखी और रहस्यमयी रस्मों से भी है, जो इसे दुनिया भर में खास बनाती हैं। इन्हीं में से एक है निशा जात्रा- एक ऐसी परंपरा जिसे तंत्र साधना से जोड़कर देखा जाता है और जिसे कई लोग “काला जादू की रस्म” भी कहते हैं।

इस वर्ष निशा जात्रा की रस्म मंगलवार-बुधवार की दरमियानी रात करीब 2 बजे, बेहद गुप्त और पारंपरिक विधि-विधान के साथ संपन्न हुई। पूरा वातावरण गूंज रहा था मंत्रोच्चार, ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक बांसुरी की धुन से।
तंत्र साधना से जुड़ी परंपरा:
इतिहासकार बताते हैं कि प्राचीनकाल में बस्तर के राजाओं द्वारा इस रस्म की शुरुआत अपने राज्य को बुरी आत्माओं और दुष्ट शक्तियों से बचाने के लिए की गई थी। आधी रात को की जाने वाली यह साधना तंत्र-मंत्र की शक्ति और देवी-देवताओं की आराधना का अद्भुत संगम मानी जाती है। यही कारण है कि इसे देखने और समझने दूर-दूर से लोग बस्तर पहुंचते हैं।

राजघराने से जुड़ा महत्व:
बस्तर दशहरे का हर आयोजन राजघराने की परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। निशा जात्रा में भी राजपरिवार की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भागीदारी रहती है। रस्म के दौरान विशेष मंत्रोच्चार, बलि की परंपरा और गोपनीय साधना की जाती है, जिसे आम लोग करीब से देख भी नहीं पाते।
आज भी कायम है रहस्य:
स्थानीय लोग मानते हैं कि निशा जात्रा सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि बस्तर की आस्था और परंपरा का हिस्सा है। कई ग्रामीण आज भी इसे राज्य और समाज की सुरक्षा से जोड़कर देखते हैं। खास बात यह है कि आधुनिकता और तकनीक के दौर में भी यह परंपरा अपनी मौलिकता और रहस्यमयी स्वरूप को बनाए हुए है।

बस्तर दशहरे की अनोखी पहचान:
75 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में जहां रथ यात्रा, मुरिया दरबार और मां दंतेश्वरी की पूजा मुख्य आकर्षण होते हैं, वहीं निशा जात्रा जैसी गूढ़ रस्में इसकी अलग ही पहचान बनाती हैं। यही वजह है कि बस्तर दशहरा सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि संस्कृति, आस्था और रहस्यमयी परंपराओं का अद्भुत संगम है।
