फूटा आदिवासियों का दर्द: 48 गांवों के 500 ग्रामीणों ने खून से लिखा PM मोदी को पत्र; कहा- ‘साहेब! 21वीं सदी में भी अंधेरे में कट रही जिंदगी’…NV News

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NV News Gariyaband: छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के आदिवासी बहुल राजा पड़ाव क्षेत्र से एक ऐसी झकझोर देने वाली और भावुक कर देने वाली तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। आजादी के दशकों बाद और 21वीं सदी के इस आधुनिक दौर में भी विकास की मुख्यधारा से कटे 48 गांवों के लगभग 500 ग्रामीणों ने बिजली की मांग को लेकर एक अत्यंत आत्मघाती और मार्मिक कदम उठाया है। वर्षों से अंधेरे में जिंदगी गुजारने को मजबूर इन ग्रामीणों ने अपने खुद के खून से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के नाम एक पत्र लिखा है। खून से सने इस खत के जरिए ग्रामीणों ने प्रधानमंत्री से गुहार लगाई है कि उन्हें लालटेन और मोमबत्ती के युग से बाहर निकालकर गांवों में बिजली की रोशनी पहुंचाई जाए।

ग्रामीणों का कहना है कि वे पिछले कई सालों से बिजली की मांग को लेकर स्थानीय प्रशासन से लेकर सरकार के मंत्रियों तक के चक्कर काट चुके हैं। कई बार उग्र आंदोलन और शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी किए गए, लेकिन हर बार उन्हें केवल खोखले आश्वासन ही मिले, धरातल पर समस्या का कोई समाधान नहीं हुआ। दरअसल, यह पूरा इलाका उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के बफर और कोर जोन के अंतर्गत आता है, जिसके कारण राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के कड़े नियमों और वन विभाग की आपत्तियों की वजह से यहां बिजली के खंभे और तार नहीं बिछाए जा पा रहे हैं। नियमों के इसी तकनीकी फेर में फंसकर 48 गांवों के हजारों आदिवासियों की जिंदगी दशकों से नरक बनी हुई है।

खून से लिखे इस पत्र में ग्रामीणों ने अपनी जो पीड़ा बयां की है, वह वाकई सिस्टम की नाकामी को दर्शाती है। ग्रामीणों ने लिखा है कि बिजली न होने के कारण उनके बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह से चौपट हो चुकी है, रात होते ही पूरा इलाका घने अंधेरे में डूब जाता है जिससे हिंसक वन्यजीवों का खतरा बना रहता है। सबसे बदतर स्थिति स्वास्थ्य सेवाओं की है, जहां बिना बिजली के प्राथमिक इलाज और प्रसव जैसी आपातकालीन सुविधाएं भी प्रभावित हो रही हैं। थक-हारकर अब ग्रामीणों ने अपनी इस असहनीय पीड़ा को सीधे देश के प्रधान सेवक तक पहुंचाने के लिए यह रास्ता चुना है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि इस बार भी उनकी मांग पूरी नहीं हुई, तो वे अपने अधिकारों के लिए और भी बड़ा कदम उठाने को मजबूर होंगे।

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