नक्सलवाद के अंत की आहट: 10 करोड़ का इनामी माओवादी लीडर गणपति कर सकता है सरेंडर, अमित शाह से मुलाकात की संभावना…NV News
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भारतीय माओवादी आंदोलन के पूर्व महासचिव मुप्पला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति के आत्मसमर्पण की खबरें इन दिनों चर्चा का केंद्र बनी हुई हैं। सूत्रों के अनुसार, खराब स्वास्थ्य और बढ़ती उम्र (77 वर्ष) के चलते गणपति हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने पर विचार कर रहे हैं। चर्चा है कि वे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के सामने सरेंडर कर सकते हैं। गणपति पर विभिन्न राज्यों को मिलाकर लगभग ₹10 करोड़ (विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार कुल संचयी इनाम) का इनाम घोषित है, और वे दशकों से सुरक्षा एजेंसियों के लिए “मोस्ट वांटेड” बने हुए हैं।
इस संभावित आत्मसमर्पण की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने हाल ही में नई दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की है। इस बैठक में गणपति के सरेंडर और उसके बाद की पुनर्वास प्रक्रिया (Rehabilitation) पर विस्तृत चर्चा हुई है। बताया जा रहा है कि गणपति पिछले कुछ समय से नेपाल में छिपे हुए थे और अब उनके परिवार के सदस्य भी उन पर सामान्य जीवन में लौटने का दबाव बना रहे हैं। यदि यह सरेंडर होता है, तो इसे माओवादी विचारधारा के लिए अब तक का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक झटका माना जाएगा।
केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 तक देश को ‘वामपंथी उग्रवाद’ (LWE) से पूरी तरह मुक्त करने का लक्ष्य रखा है। ऐसे में गणपति जैसे शीर्ष नेता का मुख्यधारा में लौटना इस लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। उनके पास संगठन के फंडिंग नेटवर्क, भविष्य की योजनाओं और अन्य शीर्ष नेताओं के ठिकानों की महत्वपूर्ण जानकारी हो सकती है। हालांकि, सीपीआई (माओवादी) के आधिकारिक गुटों ने इन खबरों को सरकार की ‘साजिश’ करार दिया है, लेकिन खुफिया इनपुट कुछ और ही इशारा कर रहे हैं।
गणपति ने 2018 में स्वास्थ्य कारणों से महासचिव का पद छोड़ दिया था, जिसके बाद बसवराज को यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उनके आत्मसमर्पण से न केवल छत्तीसगढ़, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में सक्रिय कैडरों का मनोबल टूटेगा, बल्कि यह अन्य नक्सलियों के लिए भी हथियार डालने का एक बड़ा उदाहरण बनेगा। वर्तमान में, दिल्ली और तेलंगाना की सुरक्षा एजेंसियां समन्वय बनाकर इस पूरी प्रक्रिया को अंतिम रूप देने में जुटी हैं।
