बस्तर के साथ ‘क्रूर मजाक’: 211 करोड़ का सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल ‘ट्रायल’ में कैद, न डॉक्टर मिले न मरीज…NV News

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जगदलपुर (छत्तीसगढ़): बस्तर संभाग के लाखों आदिवासियों और नक्सल मोर्चे पर तैनात जवानों के लिए उम्मीद की किरण बना 211 करोड़ रुपये का सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल खुद ‘बीमार’ नजर आ रहा है। प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत निर्मित यह भव्य अस्पताल वर्तमान में केवल एक शो-पीस बनकर रह गया है। आलम यह है कि उद्घाटन के महीनों बाद भी अस्पताल ‘ट्रायल रन’ के नाम पर अटका हुआ है, जहाँ न तो विशेषज्ञ डॉक्टर तैनात हैं और न ही मरीजों का इलाज शुरू हो पा रहा है।

डिमुरापाल स्थित इस सात मंजिला अस्पताल के संचालन की जिम्मेदारी हैदराबाद की कॉन्टिनेंटल हॉस्पिटल प्राइवेट लिमिटेड को पीपीपी (PPP) मोड पर सौंपी गई है। एमओयू (MoU) हुए 6 महीने बीत चुके हैं और औपचारिक हैंडओवर भी हो गया है, लेकिन धरातल पर सुविधाएं शून्य हैं। औचक निरीक्षण के दौरान पाया गया कि इमरजेंसी वार्ड में एक भी डॉक्टर ड्यूटी पर तैनात नहीं था। नर्सिंग स्टाफ का कहना है कि “मरीज नहीं आते, इसलिए डॉक्टर ऑन-कॉल रहते हैं,” जो कि एक सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल की परिभाषा पर ही सवालिया निशान है।

इलाज से ज्यादा अस्पताल अपनी कड़ी सुरक्षा को लेकर चर्चा में है। मुख्य गेट पर मरीजों और परिजनों से लंबी पूछताछ और मोबाइल नंबर दर्ज करने की प्रक्रिया में ही 15-20 मिनट बर्बाद हो जाते हैं। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि इतनी सख्त चेकिंग और डॉक्टरों की अनुपलब्धता के कारण वे यहाँ आने के बजाय रायपुर या विशाखापट्टनम जाना बेहतर समझते हैं। आदिवासियों के नाम पर बने इस अस्पताल में भारी भरकम जांच शुल्क और आयुष्मान कार्ड की अनदेखी को लेकर राजनीतिक विरोध भी शुरू हो गया है।

बस्तर की जनता आज भी गंभीर बीमारियों के लिए एयरलिफ्ट या लंबी यात्रा करने को मजबूर है, जबकि 211 करोड़ की लागत से बना यह ढांचा सफेद हाथी साबित हो रहा है। प्रशासन का दावा है कि जल्द ही सभी विभागों में पूर्णकालिक डॉक्टरों की नियुक्ति की जाएगी, लेकिन फिलहाल ‘ट्रायल’ के इस खेल ने बस्तर की सेहत को दांव पर लगा दिया है।

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