CG High court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से सेवानिवृत्त कर्मचारी को बड़ी राहत, सरकारी आवास खाली कराने के नोटिस पर लगी रोक
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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की वेकेशन बेंच ने शीतकालीन अवकाश के दौरान एक अहम आदेश पारित करते हुए छत्तीसगढ़ स्टेट इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (CSIDC) के सेवानिवृत्त कर्मचारी को बड़ी राहत दी है। जस्टिस एन. के. व्यास की स्पेशल कोर्ट ने तीन दिनों के भीतर सरकारी आवास खाली कराने के लिए जारी नोटिस पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।
मामला सीएसआईडीसी के सेवानिवृत्त कैशियर एवं अकाउंटेंट ओ.पी. सिंह (72 वर्ष) से जुड़ा है। उन्हें सेवा काल के दौरान कोरबा स्थित राज्य परिवहन कॉलोनी में सरकारी आवास आवंटित किया गया था। सेवानिवृत्ति के बाद उनके सेवा-देयकों के भुगतान को लेकर विभाग से विवाद उत्पन्न हो गया, जिसके चलते उन्होंने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए हाईकोर्ट का रुख किया।
इस प्रकरण में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहले ही 9 अक्टूबर 2025 को महत्वपूर्ण आदेश पारित कर चुका था। कोर्ट ने राजस्व सचिव को निर्देश दिए थे कि याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन पर कानून एवं नियमों के अनुसार शीघ्र निर्णय लिया जाए। साथ ही स्पष्ट किया गया था कि अभ्यावेदन के निपटारे तक याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
इसके बावजूद, 24 दिसंबर 2025 को याचिकाकर्ता को नोटिस जारी कर तीन दिनों के भीतर सरकारी आवास खाली करने के निर्देश दिए गए। इस नोटिस से याचिकाकर्ता मानसिक तनाव में आ गए और उन्हें बेदखली की आशंका सताने लगी, जिसके बाद उन्होंने तत्काल सुनवाई की मांग की।
मामले की गंभीरता को देखते हुए शीतकालीन अवकाश के दौरान 27 दिसंबर को जस्टिस एन. के. व्यास ने स्पेशल कोर्ट में सुनवाई की। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि पूर्व आदेश के बावजूद इस प्रकार का नोटिस जारी करना अनुचित है।
हाईकोर्ट ने सीएसआईडीसी को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन पर तीन सप्ताह के भीतर निर्णय ले। साथ ही यह भी आदेश दिया कि जब तक अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक 24 दिसंबर 2025 को जारी किया गया आवास खाली करने का नोटिस प्रभावी नहीं रहेगा और याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी प्रकार की बेदखली या दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
कोर्ट के इस आदेश से सेवानिवृत्त कर्मचारी ओ.पी. सिंह को बड़ी राहत मिली है। साथ ही अदालत ने प्रशासनिक अधिकारियों को यह संदेश भी दिया कि न्यायालय के पूर्व आदेशों की अवहेलना कानून की भावना के विपरीत है।
