CG Bribery Case: 23 साल बाद मिला न्याय, HC ने कहा – “नोट मिलना रिश्वत नहीं”…NV News
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बिलासपुर /(CG Bribery Case): 23 साल पुराने एक भ्रष्टाचार मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने बिल्हा तहसील कार्यालय के तत्कालीन क्लर्क बाबूराम पटेल को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ आरोपी के पास से नोट बरामद होना रिश्वत लेने का ठोस सबूत नहीं माना जा सकता, जब तक यह सिद्ध न हो कि उसने रिश्वत की मांग की और उसे अवैध रूप से स्वीकार किया।
दरअसल,20 फरवरी 2002 को मथुरा प्रसाद यादव नामक व्यक्ति ने लोकायुक्त कार्यालय, बिलासपुर में शिकायत दर्ज कराई थी कि क्लर्क बाबूराम पटेल ने उसके पिता की जमीन का खाता अलग करने के लिए ₹5,000 की रिश्वत मांगी थी। बाद में यह रकम घटाकर ₹2,000 तय हुई।
शिकायत पर लोकायुक्त टीम ने ट्रैप की कार्रवाई की। टीम ने शिकायतकर्ता को ₹100 के 15 नोट दिए, जिन पर फिनाल्फ्थेलीन पाउडर लगाया गया था। आरोप था कि आरोपी ने शिकायतकर्ता से ₹1,500 लेकर जेब में रख लिए और उसी दौरान टीम ने उसे पकड़ लिया। जांच के दौरान उसके हाथों और कपड़ों को धुलवाया गया, जिससे घोल गुलाबी हो गया,जो कथित तौर पर रिश्वत लेने का संकेत था।
ट्रायल कोर्ट का फैसला:
लंबी सुनवाई के बाद, प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश, बिलासपुर ने 30 अक्टूबर 2004 को बाबूराम पटेल को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी करार दिया।उन्हें एक-एक वर्ष की कठोर कैद और जुर्माने की सजा सुनाई गई थी।
हाई कोर्ट में अपील:
बाबूराम पटेल ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी। उनके वकील विवेक शर्मा ने दलील दी कि यह पूरा मामला निजी द्वेष से प्रेरित है।शिकायतकर्ता की पत्नी गांव की पूर्व सरपंच थीं और उनके खिलाफ चल रही एक जांच में बाबूराम पटेल शामिल थे। इस वजह से, झूठे आरोप लगाकर उन्हें फंसाया गया।
हाई कोर्ट ने क्या कहा:
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने पाया कि ट्रैप टीम के सदस्यों के बयान परस्पर विरोधाभासी हैं।कोर्ट ने कहा- “सिर्फ नोटों का मिलना यह साबित नहीं करता कि आरोपी ने रिश्वत मांगी या स्वीकार की। अभियोजन यह सिद्ध नहीं कर सका कि यह रकम अवैध लाभ के रूप में ली गई।”
कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया, और अभियोजन संदेह से पूरे मामला सिद्ध करने में असफल रहा।
आखिरकार मिला न्याय:
23 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, हाई कोर्ट ने 30 अक्टूबर 2004 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए बाबूराम पटेल को सभी आरोपों से बरी कर दिया।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “रिश्वत” साबित करने के लिए दो बातें जरूरी हैं-
1.मांग का सबूत।
2.स्वीकार करने का प्रमाण।
इन दोनों के अभाव में केवल नोटों की बरामदगी को रिश्वत का सबूत नहीं माना जा सकता।
23 साल की कानूनी जंग का अंत:
इस फैसले ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि न्याय में भले देर हो, पर सत्य की जीत होती है।बाबूराम पटेल के लिए यह फैसला सिर्फ एक कानूनी राहत नहीं, बल्कि 23 साल से माथे पर लगे कलंक से मुक्ति का प्रतीक है।
