“Organized PDS Rice Scam”: तकनीकी गड़बड़ी या संगठित साजिश?पढ़ें पूरी खबर…NV News

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CG Scam News:छत्तीसगढ़ के 10 आदिवासी बहुल जिलों में सरकारी राशन यानी पीडीएस चावल वितरण में भारी गड़बड़ी का खुलासा हुआ है। खाद्य विभाग की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, 4,63,319 टन चावल, जिसकी बाजार कीमत करीब 128.09 करोड़ रुपये है, कालाबाजार में बेचा गया। इस घोटाले में 298 राशन दुकानों के नाम सामने आए हैं, लेकिन कार्रवाई का हाल यह है कि केवल 112 पर ही ठोस कदम उठाए गए हैं।

विधानसभा में खुलासा:

प्रदेश विधानसभा में तारांकित प्रश्न-58 के जवाब में खाद्य विभाग ने यह चौंकाने वाला आंकड़ा पेश किया। रिपोर्ट के मुताबिक, जिन जिलों में यह गड़बड़ी सामने आई है, वे ज्यादातर आदिवासी बहुल हैं। विधानसभा जांच समिति अब इस रिपोर्ट की समीक्षा कर आगे की कार्यवाही तय करेगी।

सवालों के घेरे में सिस्टम:

जांच समिति के सदस्य हैरान हैं कि राशन दुकानों का स्टॉक संचालनालय को भेजने के बाद भी ‘बचत स्टॉक’ में कटौती क्यों नहीं हुई। तकनीकी गड़बड़ी का हवाला देते हुए एनआईसी ने सामान्य जिलों के लगभग 400 करोड़ रुपये के चावल का समायोजन कर दिया, लेकिन आदिवासी जिलों में यह राहत नहीं दी गई। सूत्रों के अनुसार, यहां के अधिकारियों ने कोई “दूसरा रास्ता” अपनाने से इंकार कर दिया, जिससे गड़बड़ी साफ नज़र आई।

घोटाले का पैमाना:

जिले – 10 (अधिकांश आदिवासी बहुल)

गबन किया चावल – 4,63,319 टन

कुल कीमत – 128.09 करोड़ रुपये

सबसे ज्यादा गड़बड़ी कोरबा जिला में।

कार्रवाई का आंकड़ा:

खाद्य विभाग की रिपोर्ट बताती है कि 298 राशन दुकानों में अनियमितता पाई गई। इनमें से-

50 दुकानें निलंबित

31 दुकानें निरस्त

31 को राजस्व वसूली नोटिस

कुल ठोस कार्रवाई – 112 दुकानों पर ही हुई हैं। बाकी दुकानदारों ने खुले बाजार से चावल खरीदकर सरकारी स्टॉक पूरा कर लिया और रिकॉर्ड में गड़बड़ी छिपाकर बच निकलने में सफल रहे।

कौन से जिले आगे निकले गड़बड़ी में?

1. कोरबा – 37,276 क्विंटल चावल का अवैध लेन-देन, नुकसान ₹16.59 करोड़

2. सरगुजा – 36,781 क्विंटल, नुकसान ₹15.31 करोड़

3. बलरामपुर – 40,026 क्विंटल, नुकसान ₹14.22 करोड़ इसके अलावा,

4.बस्तर – ₹13.24 करोड़

5.सूरजपुर – ₹13.06 करोड़

6.कांकेर – ₹12.73 करोड़

7.कवर्धा – ₹12.31 करोड़

8.सक्ती – ₹11.59 करोड़

9.जशपुर – ₹11.08 करोड़

10.बिलासपुर – ₹7.96 करोड़

संगठित गड़बड़ी के संकेत:

खाद्य विभाग के सूत्रों का कहना है कि यह घोटाला संगठित तरीके से किया गया है। कई दुकानदारों ने कार्रवाई से बचने के लिए बाजार से चावल खरीदकर स्टॉक पूरा कर दिया, ताकि रिकॉर्ड में हेरफेर नज़र न आए। इस चालाकी के चलते कई दोषी कानूनी पचड़े से बच गए।

विशेषज्ञों की राय:

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस मामले की उच्च स्तरीय जांच हुई, तो यह सिर्फ 128 करोड़ का नहीं बल्कि कहीं बड़ा घोटाला साबित हो सकता है। चावल की मात्रा और जिलों की संख्या को देखते हुए यह मामला राज्य के सबसे बड़े पीडीएस घोटालों में गिना जा सकता है।

राजनीतिक हलचल:

विधानसभा में यह मुद्दा उठते ही विपक्ष ने सरकार पर घोटाले को दबाने का आरोप लगाया। विपक्षी दलों का कहना है कि 298 दुकानों के खिलाफ नाम आने के बावजूद कार्रवाई केवल चुनिंदा पर हुई, जो साफ तौर पर ‘मिलिभगत’ की ओर इशारा करता है। वहीं, सरकार का कहना है कि जांच जारी है और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

आम जनता की नाराजगी:

पीडीएस का मकसद गरीब और जरूरतमंद परिवारों को सस्ती दरों पर अनाज उपलब्ध कराना है। ऐसे में आदिवासी इलाकों में इस तरह की कालाबाजारी से ग्रामीणों का भरोसा टूटना तय है। कई स्थानों से शिकायत आई है कि महीने भर का राशन समय पर नहीं मिलता या फिर आधा ही मिलता है।

अगला कदम:

विधानसभा जांच समिति इस रिपोर्ट की बारीकी से समीक्षा कर रही है। अगर जांच में नए सबूत मिले तो इसमें शामिल अधिकारियों और बड़े कारोबारियों पर भी कार्रवाई हो सकती है। प्रशासन को यह भी जांचना होगा कि चावल कहां और किस चैनल के जरिए बेचा गया।

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