मुंगेली में गौ-तस्करी बनी गंभीर चुनौती: प्रशासन की निष्क्रियता पर उठे सवाल, धर्म की राजनीति बनाम ज़मीनी हकीकत

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NV News Mungeli:छत्तीसगढ़ का मुंगेली जिला आज गौ-तस्करी का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। ग्रामीण इलाकों में यह गैरकानूनी धंधा इतनी तेजी से फैला है कि अब इसे कई लोग रोजगार के रूप में अपना चुके हैं। सड़कों और हाईवे से होकर ट्रकों में भर-भरकर, व पैदल गायों को अवैध रूप से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया जा रहा है। धार्मिक आयोजनों और पर्वों के बीच जहां एक ओर लोग पूजा-पाठ और जश्न में डूबे होते हैं, वहीं दूसरी ओर विधर्मी तत्व गायों को एकत्र कर उन्हें तस्करी के लिए भेज रहे हैं।

यह सब कुछ खुलेआम हो रहा है, और हैरानी की बात यह है कि प्रशासन और सरकार की ओर से कोई सख्त कार्रवाई अब तक देखने को नहीं मिली है। मुंगेली में यह घटनाएं अब इतनी आम हो चुकी हैं कि स्थानीय लोगों ने भी इसे अपनी नियति मान लिया है।

मुंगेली राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण जिला है। यहां प्रदेश के उपमुख्यमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और भाजपा के विधायक हैं। राज्य और केंद्र दोनों जगह भाजपा की सरकार है, जो खुद को हिंदू हितों की रक्षक पार्टी के रूप में प्रस्तुत करती है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या गायों की सुरक्षा और हिंदू आस्था की रक्षा केवल भाषणों और चुनावी मंचों तक ही सीमित रह गई है?

कई बार स्थानीय लोगों द्वारा पुलिस और प्रशासन को जानकारी देने के बावजूद या तो कार्रवाई नहीं होती, और अगर होती भी है तो महज़ औपचारिकता निभाई जाती है। छोटे-मोटे तस्करों को पकड़ कर छोड़ दिया जाता है, जबकि पूरे नेटवर्क को पकड़ने की कोई ठोस कोशिश नजर नहीं आती।

तस्करों को कानून का कोई डर नहीं है। उन्हें यह भरोसा है कि अगर पकड़े भी गए तो दो-तीन दिन में ज़मानत पर छूट जाएंगे। यही कारण है कि मुंगेली में गौ-तस्करी अब एक संगठित और मुनाफे वाला धंधा बन चुका है।

विचारणीय बात यह है कि प्रशासन आखिर इस मुद्दे पर गंभीर क्यों नहीं है? क्या इसके पीछे राजनीतिक संरक्षण है? क्या यह भ्रष्टाचार और मिलीभगत का परिणाम है? जब गायों को ट्रकों में भरकर ले जाया जा रहा होता है, तो कैसे पुलिस की आंखों से यह सब छिपा रह सकता है?

वर्तमान में जो स्थिति बन गई है, वह न केवल कानून व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है बल्कि हिंदू धर्म और आस्था से जुड़े लोगों के लिए भी गहरी चोट है। धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं और संगठनों की असली परीक्षा इसी समय होती है, जब जमीन पर उनकी कथनी और करनी का फर्क सामने आता है।

गौशालाओं में दान देना, धार्मिक आयोजनों में गायों की पूजा करना या खुद को धार्मिक बताना तब तक व्यर्थ है, जब तक आसपास हो रही इस तरह की घटनाओं को रोका न जाए। यदि कोई अपने ही मोहल्ले, गांव या जिले की गायों की रक्षा नहीं कर सकता, तो धर्म का दिखावा महज़ पाखंड बनकर रह जाता है।

प्रशासन और सरकार को चाहिए कि इस विषय को अत्यंत गंभीरता से ले। केवल गिरफ्तारी और ज़मानत से आगे बढ़कर, पूरे तस्करी नेटवर्क को तोड़ने की जरूरत है। इसके लिए गुप्तचर एजेंसियों की मदद, स्थानीय मुखबिर तंत्र की मजबूती और सख्त कानूनी कार्रवाई अनिवार्य है।

अब सवाल यह है कि क्या सरकार इस बढ़ती तस्करी को रोकने के लिए कोई ठोस रणनीति अपनाएगी, या फिर यह मुद्दा भी केवल धार्मिक भावनाओं को भुनाने का माध्यम बनकर रह जाएगा? मुंगेली की जनता और पूरे प्रदेश के गौभक्तों की निगाहें अब सरकार की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।

यदि समय रहते इस पर कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो न केवल गायों की रक्षा असंभव हो जाएगी, बल्कि सरकार की छवि और हिंदू आस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े होंगे।

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